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श्री भरत जी की आरती

Shree Bharat Ji Ki Aarti | Aarti Haran Bharat Ki

श्री भरत जी की आरती
आरति आरति-हरन भरतकी।
सीयारामपदपंकज रतकी॥

धर्मधुरंधर धीर, बीरबर।
रामसीय-जस-सौरभ मधुकर।
सील सनेह निबाह निरतकी॥

परमप्रीति पथ प्रगट लखावन।
निज गुनगन जस अघ विद्रावन।
परछत पीय प्रेम मूरतकी॥

बुद्धि-विवेक ज्ञानगुन इक रस।
रामानुज संतनके सरबस।
'हरिचंद' प्रभु विषयविरतकी॥
॥ इति संपूर्णंम् ॥

आरती का महत्त्व

"आरति आरति-हरन भरतकी" श्री भरत जी की स्तुति में गाई जाने वाली एक अत्यंत भावपूर्ण आरती है। भरत जी को भ्रातृ-प्रेम, त्याग और भक्ति का साक्षात स्वरूप माना जाता है। यह आरती उनके निस्वार्थ प्रेम और भगवान राम के प्रति उनकी अटूट निष्ठा को नमन करती है।

आरती के मुख्य भाव

  • आरति-हरन (Remover of Suffering): "आरति आरति-हरन भरतकी" - भरत जी का स्मरण भक्तों के दुखों (आरति) का हरण करने वाला है।
  • राम-सीता भक्ति (Devotion to Ram-Sita): "सीयारामपदपंकज रतकी" - भरत जी का मन सदैव सीता और राम के चरण कमलों में लीन रहता है।
  • प्रेम की मूरत (Idol of Love): "परछत पीय प्रेम मूरतकी" - भरत जी साक्षात प्रेम की मूर्ति हैं, जिनका दर्शन पापों का नाश करता है।

गायन विधि और अवसर

  • अवसर (Occasion): यह आरती राम नवमी, भरत मिलाप और नित्य पूजा के समय गाई जाती है।
  • विधि (Method): प्रभु राम के दरबार में, भरत जी का ध्यान करते हुए, धूप-दीप के साथ श्रद्धापूर्वक यह आरती गाएं।
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