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श्री शंकर आरती (जय जय त्र्यंबकराज)

Trimbakeshwar Aarti in Marathi

श्री शंकर आरती (जय जय त्र्यंबकराज)
जय जय त्र्यंबकराज गिरिजानाथा गंगाधरा हो।
त्रिशूल पाणी शंभो नीलग्रीवा शशिशेखरा हो॥
वृषभारुढ फणिभूषण दशभुज पंचानन शंकरा हो।
विभूतिमाळाजटा सुंदर गजचर्मांबरधरा हो॥

पडलें गोहत्येचें पातक गौतमऋषिच्या शिरी हो।
त्याने तप मांडिले ध्याना आणुनि तुज अंतरी हो॥
प्रसन्न होऊनि त्यातें स्नाना दिधली गोदावरी हो।
औदुंबरमुळी प्रगटे पावन त्रैलोक्यातें करी हो॥१॥

धन्य कुशावर्ताचा महिमा वाचे वर्णं किती हो।
आणिकही बहुतीतें गंगाद्वारादिक पर्वती हो॥
वंदन मार्जन करिती त्याचे महादोष नासती हो।
तुझिया दर्शनमात्रे प्राणी मुक्तीतें पावती हो॥२॥

ब्रह्मगिरींची भावें ज्याला प्रदक्षिणा जरी घडे हो।
तैं ते काया कष्टें जंव जंव चरणी रुपती खडे हो॥
तंव तंव पुण्य विशेष किल्मिष अवधें त्याचें झडे हो।
केवळ तो शिवरुपी काळ त्याच्या पाया पडे हो॥३॥

लावुनिया निजभजनी सकळही पुरविसी मनकामना हो।
संतति संपत्ति देसी अंती चुकविसी यमयातना हो॥
शिव शिव नाम जपता वाटे आनंद माझ्या मना हो।
गोसावीनंदन विसरे संसारयातना हो॥४॥

इस आरती का विशिष्ट महत्व

"जय जय त्र्यंबकराज" भगवान शिव को समर्पित एक प्रसिद्ध मराठी आरती है, जो विशेष रूप से त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग (Trimbakeshwar Jyotirlinga) की महिमा का गुणगान करती है। त्र्यंबकेश्वर, नासिक (महाराष्ट्र) में स्थित बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है और इसका महत्व अद्वितीय है क्योंकि यहाँ ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों एक साथ लिंग रूप में विराजमान हैं। यह आरती भगवान शिव के 'त्र्यंबकराज' अर्थात तीन नेत्रों वाले राजा के रूप की स्तुति करती है और गोदावरी नदी (Godavari River) के उद्गम की पौराणिक कथा का भी वर्णन करती है, जो इसी स्थान से जुड़ी हुई हैं।

आरती के प्रमुख भाव और अर्थ

यह आरती त्र्यंबकेश्वर क्षेत्र की पौराणिक कथा और महिमा को दर्शाती ਹੈ:

  • त्र्यंबकेश्वर का स्वरूप (Form of Trimbakeshwar): आरती की पहली पंक्तियाँ भगवान शिव के विविध रूपों का वर्णन करती हैं - 'गिरिजानाथा' (पार्वती के पति), 'गंगाधरा' (Ganga on his head), 'त्रिशूल पाणी' (हाथ में त्रिशूल धारण करने वाले), और 'नीलग्रीवा' (नीले कंठ वाले)।
  • गौतम ऋषि की कथा (Story of Gautama Rishi): "पडलें गोहत्येचें पातक गौतमऋषिच्या शिरी हो" - आरती में गौतम ऋषि की प्रसिद्ध कथा का उल्लेख ਹੈ, जिन्हें अनजाने में लगे गोहत्या के पाप से मुक्ति पाने के लिए भगवान शिव की तपस्या करनी पड़ी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर शिव ने अपनी जटाओं से गंगा को मुक्त किया, जो पृथ्वी पर 'गोदावरी' के नाम से प्रसिद्ध हुईं।
  • कुशावर्त और ब्रह्मगिरि की महिमा (Glory of Kushavarta and Brahmagiri): आरती में कुशावर्त कुंड का उल्लेख है, जहाँ गोदावरी प्रकट हुईं, और ब्रह्मगिरि पर्वत की परिक्रमा के महत्व को बताया गया है। कहा जाता ਹੈ कि इस पर्वत की परिक्रमा करने से व्यक्ति के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और स्वयं काल भी उसके चरणों में झुक जाता हैं।
  • मनोकामना पूर्ति (Fulfillment of Desires): अंतिम पद में भक्त प्रार्थना करता ਹੈ कि भगवान अपने भक्तों की सभी मनोकामनाएं (wishes) पूर्ण करते हैं, उन्हें संतति और संपत्ति प्रदान करते हैं और अंत में यम की यातना से भी मुक्त करते हैं।

आरती करने की विधि और विशेष अवसर

  • यह आरती विशेष रूप से महाशिवरात्रि (Mahashivratri) और श्रावण मास (Shravan Month) में, त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग की पूजा के दौरान गाई जाती है।
  • जो भक्त त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन के लिए जाते हैं, वे कुशावर्त कुंड में स्नान और ब्रह्मगिरि पर्वत की परिक्रमा के बाद इस आरती का पाठ करते हैं।
  • कालसर्प दोष या पितृ दोष से मुक्ति के लिए त्र्यंबकेश्वर में की जाने वाली विशेष पूजा के बाद भी इस आरती का गान किया जाता है।
  • इसका नियमित पाठ करने से व्यक्ति को बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक की पूजा का पुण्य प्राप्त होता है और भगवान शिव की असीम कृपा मिलती हैं।
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