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श्री सत्यनारायणाची आरती (जय जय दीनदयाळा)

Satyanarayan Aarti Marathi

श्री सत्यनारायणाची आरती (जय जय दीनदयाळा)
जय जय दीनदयाळा सत्यनारायण देवा।
पंचारती ओवाळू श्रीपति तुज भक्तिभावा॥
जय जय दीनदयाळा...॥

विधियुक्त पूजुनी करिती पुराण श्रवण।
परिमळ द्रव्यासहित पुष्पमाळा अर्पून॥
धृतयुक्त शर्करामिश्रित गोधूमचूर्ण।
प्रसाद भक्षण करिता प्रसन्न तू नारायणा॥
जय जय दीनदयाळा...॥

शतानंदविप्रे पूर्वी व्रत हे आचरिले।
दरिद्र दवडूनी अंती त्याते मोक्षपदा नेले॥
त्यापासुनि हे व्रत कलियुगी सकळां श्रुत झाले।
भावार्थे पूजितां सर्वा ईच्छित लाभले॥
जय जय दीनदयाळा...॥

साधु वैश्ये संततिसाठी तुजला प्राथर्लिे।
इच्छित पुरता मदांध होऊनि व्रत न आचरिले॥
त्या पापाने संकटी पडुनी दुःखहि भोगीले।
स्मृति होऊनि आचरिता व्रत त्या तुवाचि उद्धरिले॥
जय जय दीनदयाळा...॥

प्रसाद विसरूनि पतिभेटीला कलावती गेली।
क्षोभ तुझा होताचि तयांचि नौका बुडाली॥
अंगध्वज राजासी यापरी दुःखस्थिती आली।
मृतवार्ता शतपुत्रांची सत्वर कर्णी पसरली॥
जय जय दीनदयाळा...॥

पुनरपि पूजनी प्रसाद ग्रहण करिता तत्क्षणी।
पतिची नौका तरली देखे कलावती नयनी॥
अंगध्वज राजासी पुत्र भेटती येउनी।
ऐसा भक्तां संकटि पावसि तू चक्रपाणी॥
जय जय दीनदयाळा...॥

अनन्य भावे पूजुनि हे व्रत जे नर आचरती।
इच्छित पुरविसी त्यांते देउनि संतति संपत्ती॥
संहरती भय दुरिते सर्वहि बंधने तुटती।
राज रंक समान मानुनि पावसी श्रीपती॥
जय जय दीनदयाळा...॥

ऐसा तव व्रत अपार महिमा वर्णू मी कैसा।
भक्तिपुरःसर आचरती त्यां पावसि जगदीशा॥
भक्तीचा कनवाळू कल्पद्रुम तू सर्वेशा।
मोरेश्वरसुत तुज विनवी भवनाशा॥
जय जय दीनदयाळा...॥

इस आरती का विशिष्ट महत्व

"जय जय दीनदयाळा" भगवान सत्यनारायण (Lord Satyanarayan) को समर्पित एक प्रसिद्ध मराठी आरती है, जो विशेष रूप से सत्यनारायण पूजा (Satyanarayan Puja) के दौरान गाई जाती है। सत्यनारायण भगवान विष्णु का ही एक रूप हैं, जिन्हें सत्य का प्रतीक माना जाता है। यह आरती केवल भगवान की स्तुति नहीं है, बल्कि यह सत्यनारायण व्रत कथा के सार को भी प्रस्तुत करती है। इसमें उन पौराणिक पात्रों का उल्लेख है जिन्होंने इस व्रत को करके लाभ उठाया या इसका निरादर करके संकट में पड़े। यह आरती भक्तों को भगवान के प्रति पूर्ण श्रद्धा और व्रत के पालन के महत्व की याद दिलाती है।

आरती के प्रमुख भाव और अर्थ

यह आरती सत्यनारायण व्रत कथा के मुख्य प्रसंगों को दर्शाती है:

  • व्रत की महिमा (Glory of the Vrat): आरती में शतानंद विप्र, साधु वैश्य, कलावती और अंगध्वज राजा की कथाओं का उल्लेख है। यह बताती है कि कैसे शतानंद ब्राह्मण ने व्रत करके अपनी दरिद्रता (poverty) दूर की और मोक्ष प्राप्त किया।
  • अभिमान का दुष्परिणाम (Consequence of Arrogance): इसमें साधु वैश्य की कथा का वर्णन है, जिसने मनोकामना पूर्ण होने पर भी अहंकारवश व्रत करने का अपना वचन नहीं निभाया, जिसके कारण उसे भारी संकटों का सामना करना पड़ा। यह अहंकार त्यागने का संदेश देता है।
  • प्रसाद का महत्व (Importance of Prasad): कलावती द्वारा प्रसाद का निरादर करने और उसके परिणामस्वरूप उसके पति की नाव के डूबने की घटना, भगवान के प्रसाद के प्रति श्रद्धा रखने के महत्व को रेखांकित करती है।
  • समान कृपा (Equal Grace for All): "राज रंक समान मानुनि पावसी श्रीपती" - यह पंक्ति भगवान की सबसे बड़ी महिमा को दर्शाती है कि वे राजा और रंक में कोई भेद नहीं करते और अपनी शरण में आए सभी भक्तों पर समान रूप से कृपा करते हैं।

आरती करने की विधि और विशेष अवसर

  • यह आरती मुख्य रूप से सत्यनारायण पूजा के समापन पर कथा श्रवण के बाद की जाती है।
  • सत्यनारायण पूजा अक्सर पूर्णिमा (Purnima - full moon day) के दिन या किसी भी शुभ कार्य जैसे गृह प्रवेश, विवाह, या किसी मनोकामना की पूर्ति पर की जाती है।
  • पूजा में गेहूं के आटे, घी और चीनी से बना 'सपाद' (Sapaad) या 'शिरा' का विशेष प्रसाद बनाया जाता है, जिसका उल्लेख आरती में भी है।
  • इस आरती का भक्तिपूर्वक गान करने से पूजा पूर्ण होती है और भगवान सत्यनारायण की कृपा से घर में सुख-समृद्धि (happiness and prosperity) और शांति का वास होता है।
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