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श्रीरामचंद्रांची आरती (स्वस्वरूपोन्मुखबुद्धि)

Ram Aarti Marathi (Vedantic)

श्रीरामचंद्रांची आरती (स्वस्वरूपोन्मुखबुद्धि)
स्वस्वरूपोन्मुखबुद्धि वैदेही नेली।
देहात्मकाभिमानें दशग्रीवें हरिली॥
सद्विवेकमारुतिनें तच्छुद्धि आणिली।
तव चरणांबुजि येऊनि वार्ता श्रुत केली॥१॥

जय देव जय देव जय निजबोधा रामा।
परमार्थे आरती, सद्भावें आरती परिपूर्णकामा॥

उत्कट साधुनि शिळा सेतु बान्धोनि।
लिंगदेहलंकापुरी विद्धवंसोनी॥
कामक्रोधादिक राक्षस मर्दूनी।
देह अहंभाव रावण निवटोनि॥२॥

प्रथम सीताशोधी हनुमन्त गेला।
लंकादहन करूनी सखया मारीला॥
वधिला जंबूमाळी भुवनी त्राहाटीला।
आनंदाची गुढी घेऊनिया आला॥३॥

निजबळें निजशक्ती सोडविली सीता।
म्हणुनी येणें झाले अयोध्ये रघुनाथा॥
आनंदे ओसंडे वैराग्य भरता।
आरती घेऊनि आली कौसल्या माता॥४॥

अनुहत वाजिंत्रध्वनि गर्जती अपार।
अठरा पद्म वानर करिती भुभुःकार॥
अयोध्येसी आले दशरथकुमार।
नगरी होत आहे आनंद थोर॥५॥

इस आरती का विशिष्ट महत्व

"स्वस्वरूपोन्मुखबुद्धि" भगवान श्रीरामचंद्र को समर्पित एक अत्यंत गहन और अध्यात्मिक (spiritual) मराठी आरती है। यह आरती रामायण की घटनाओं को वेदांत (Vedanta) के दार्शनिक दृष्टिकोण से प्रस्तुत करती है, जहाँ प्रत्येक पात्र और घटना एक आध्यात्मिक प्रतीक बन जाती है। यह आरती केवल भगवान के रूप का वर्णन नहीं करती, बल्कि आत्म-ज्ञान के मार्ग को दर्शाती है। इसका मुख्य भाव "जय देव जय देव जय निजबोधा रामा" (हे आत्म-ज्ञान स्वरूप राम, आपकी जय हो) है, जो यह स्थापित करता है कि श्री राम केवल एक ऐतिहासिक राजा नहीं, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति के भीतर स्थित आत्म-ज्ञान (self-realization) के प्रतीक हैं।

आरती का आध्यात्मिक और दार्शनिक अर्थ

यह आरती रामायण को एक रूपक के रूप में प्रस्तुत करती है:

  • सीता का हरण (Abduction of Sita): "स्वस्वरूपोन्मुखबुद्धि वैदेही नेली" - यहाँ सीता जी को 'स्व-स्वरूप की ओर उन्मुख बुद्धि' (intellect turned towards the self) का प्रतीक माना गया है। "देहात्मकाभिमानें दशग्रीवें हरिली" - दस इंद्रियों के अभिमानी रावण (अहंकार) ने इस बुद्धि का हरण कर लिया है, अर्थात अहंकार के कारण हमारी बुद्धि आत्म-ज्ञान से विमुख हो जाती है।
  • हनुमान और राम-सेतु (Hanuman and the Bridge): "सद्विवेकमारुतिनें तच्छुद्धि आणिली" - सद्विवेक रूपी हनुमान ने उस बुद्धि (सीता) की शुद्धि की। "उत्कट साधुनि शिळा सेतु बान्धोनि" - साधना रूपी पत्थरों से सेतु का निर्माण कर अहंकार (रावण) और काम-क्रोधादि राक्षसों का नाश किया जाता है।
  • रावण और लंका (Ravana and Lanka): यहाँ रावण को अहंकार (ego) का और लंका को 'लिंग देह' (सूक्ष्म शरीर) का प्रतीक माना गया है। काम-क्रोधादि को राक्षस कहा गया है। राम की कृपा से इन सभी का नाश होता हैं।।
  • अयोध्या वापसी (Return to Ayodhya): "निजबळें निजशक्ती सोडविली सीता" - आत्मबल और आत्म-शक्ति से बुद्धि (सीता) को मुक्त कराकर रघुनाथ (आत्मा) अयोध्या (परम शांति की अवस्था) में वापस आते हैं। यह आध्यात्मिक यात्रा (spiritual journey) की पूर्णता का प्रतीक है।

पाठ करने की विधि और लाभ

  • यह आरती उन साधकों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है जो भक्ति के साथ-साथ ज्ञान मार्ग (path of knowledge) पर भी चल रहे हैं।
  • इसका पाठ राम नवमी और विजयादशमी जैसे पर्वों पर, या नित्य पूजा के दौरान किया जा सकता है।
  • आरती का पाठ करते समय इसके गहरे दार्शनिक अर्थ पर ध्यान करने से व्यक्ति को आत्म-विश्लेषण करने और अपने अहंकार तथा विकारों को पहचानने में मदद मिलती हैं।
  • इस आरती का नियमित पाठ करने से व्यक्ति की बुद्धि निर्मल होती है, मानसिक शांति (mental peace) मिलती है और वह आत्म-ज्ञान के मार्ग पर अग्रसर होता है।
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