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श्रीरामचंद्रांची आरती

Shree Ramchandra Aarti (Marathi) | Kay Karu Ge May

श्रीरामचंद्रांची आरती
काय करूं गे माय आतां कवणा ओंवाळू।
जिकडे पाहे तिकडे राजाराम कृपाळू॥

ओंवाळू गे माय निजमूर्ति रामा।
रामरूपी दुजेपणा न दिसे आम्हा॥१॥

सुरवर नर वानर अवघा राम सकल।
दैत्य निशाचर तेही राम केवळ॥२॥

त्रैलोक्यस्वरूपें राम संचारला एक।
सद्गुरुकृपें केशवराजी आनंद देख॥३॥
॥ इति संपूर्णंम् ॥

इस आरती का विशिष्ट महत्व

"काय करूं गे माय" एक अत्यंत भावपूर्ण आरती है जो अद्वैत वेदांत (Advaita Vedanta) के दर्शन को दर्शाती है। इसमें भक्त भगवान राम को केवल एक मूर्ति में नहीं, बल्कि सर्वत्र (Everywhere) देखता है। यह आरती भक्ति की उस पराकाष्ठा का वर्णन करती है जहाँ भक्त और भगवान के बीच का भेद समाप्त हो जाता है।

आरती के प्रमुख भाव और अर्थ

  • सर्वव्यापकता (Omnipresence): "जिकडे पाहे तिकडे राजाराम कृपाळू" - भक्त जहाँ भी दृष्टि डालता है, उसे वहाँ केवल दयालु भगवान राम ही दिखाई देते हैं। यह ईश्वर दर्शन (Vision of God) की स्थिति है।
  • भेद का नाश (End of Duality): "रामरूपी दुजेपणा न दिसे आम्हा" - राम के रूप में मुझे कोई दूसरापन (भेद) नहीं दिखता। यह समदृष्टि (Equal Vision) का प्रतीक है।
  • सृष्टि में राम (Ram in Creation): आरती में बताया गया है कि सुर, नर, वानर, यहाँ तक कि दैत्य भी राम का ही रूप हैं। यह वासुदेवः सर्वम् (God is Everything) के सिद्धांत को पुष्ट करता है।

पौराणिक संदर्भ (Mythological Context)

यह आरती संत केशवराज (Keshavraj) या उनके अनुयायी द्वारा रचित मानी जाती है। इसमें सद्गुरु (Sadguru) की कृपा से प्राप्त दिव्य दृष्टि का वर्णन है, जिससे भक्त को त्रैलोक्य में केवल एक राम ही दिखाई देते हैं।

आरती/पाठ करने की विधि और विशेष अवसर

  • विशेष अवसर (Special Occasions): यह आरती गुरु पूर्णिमा (Guru Purnima), राम नवमी (Ram Navami) और नित्य सत्संग के दौरान गाई जाती है।
  • विधि (Method): इस आरती को गाते समय भगवान की सर्वव्यापकता का चिंतन करें और मन में यह भाव लाएं कि सब कुछ राममय है।
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