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श्री ज्वालाजी की आरती

Shree Jwalaji Ki Aarti (Hindi) | Sun Meri Devi Parvatvasini

श्री ज्वालाजी की आरती
सुन मेरी देवी पर्वतवासिनि, तेरा पार न पाया॥
पान सुपारी ध्वजा नारियल, ले तेरी भेंट चढ़ाया॥

सुवा चोली तेरे अंग विराजै, केसर तिलक लगाया।
नंगे पाँव तेरे अकबर आया, सोने का छत्र चढ़ाया॥

ऊँचे-ऊँचे पर्वत बन्या देवालय, नीचे शहर बसाया।
सतयुग, त्रेता, द्वापर मध्ये, कलियुग राज सवाया॥

धूप दीप नैवेद्य आरती, मोहन भोग लगाया।
ध्यानू भगत मैया तेरा गुण गावै, मन वाञ्छित फल पाया॥
॥ इति संपूर्णंम् ॥

इस आरती का विशिष्ट महत्व

"सुन मेरी देवी पर्वतवासिनि" आरती माँ ज्वालाजी को समर्पित है, जो हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा में स्थित एक प्रमुख शक्तिपीठ (Shaktipeeth) हैं। यहाँ देवी किसी मूर्ति के रूप में नहीं, बल्कि अखंड ज्योति (Eternal Flame) के रूप में विराजमान हैं। यह आरती माँ की महिमा और भक्तों पर उनकी कृपा का गुणगान करती है।

आरती के प्रमुख भाव और अर्थ

  • मनोकामना पूर्ति (Fulfillment of Desires): "तेरा पार न पाया" - माँ की महिमा अनंत है। जो भक्त सच्चे मन से उनकी आरती गाता है, उसकी सभी मनोकामनाएं (Desires) पूर्ण होती हैं।
  • भय मुक्ति (Freedom from Fear): आरती में अकबर के अहंकार के टूटने का वर्णन है, जो दर्शाता है कि माँ के सामने बड़े से बड़ा शक्तिमान भी नतमस्तक हो जाता है। यह भक्तों को निर्भय (Fearless) बनाती है।
  • भक्ति का फल (Fruit of Devotion): ध्यानू भगत की कथा बताती है कि माँ अपने भक्तों की पुकार कभी अनसुनी नहीं करतीं।

पौराणिक संदर्भ (Mythological Context)

प्रसिद्ध कथा के अनुसार, मुगल बादशाह अकबर (Akbar) ने माँ की ज्योतियों को बुझाने की कोशिश की थी, लेकिन वह असफल रहा। अंत में, उसने क्षमा मांगते हुए सोने का छत्र (Golden Umbrella) चढ़ाया, जिसे माँ ने स्वीकार नहीं किया और वह किसी अज्ञात धातु में बदल गया।

आरती/पाठ करने की विधि और विशेष अवसर

  • विशेष अवसर (Special Occasions): यह आरती नवरात्रि (Navratri) के दौरान विशेष रूप से गाई जाती है।
  • विधि (Method): माँ ज्वालाजी के चित्र या प्रतीक (ज्योति) के सामने नारियल (Coconut) और लाल चुनरी (Chunri) अर्पित करें और फिर आरती गाएं।
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