हरशक्रविरञ्चिविमोहकरे करलालितघोषवधूहृदये॥१॥
हृदयस्थितबालकपुष्टितरे रतरञ्जितगोपवधूनिचये।
चयसञ्चितपुण्यनिधानफले फलभक्तिरसप्लुतपुष्टिनिजे॥२॥
निजमात्रसमर्पितभागपरे परमातृसुवारितदीपभरे।
भरभावितभक्तिरसैकतरे तरलोलविमोहितनेत्रवरे॥३॥
वरवल्लभदर्शितपूररसे रसविह्वललालितपादयुगे।
युगभीतिनिवर्तकधर्मरतौ रतिरस्तुममव्रजराजपतौ॥४॥
॥ इति शयनारार्तिकार्या समाप्ता ॥
Harashakraviranchivimohakare karalalitaghoshavadhuhridaye. ||1||
Hridayasthitabalkapushtitare rataranjitagopavadhunichaye,
Chayasanchitapunyanidhanaphale phalabhaktirasaplutapushtinije. ||2||
Nijamatrasamarpitabhagapare paramatrisuvaritadeepabhare,
Bharabhavitabhaktirasaikatare taralolavimohitanetravare. ||3||
Varavallabhadarshitapurarase rasavihvalalalitapadayuge,
Yugabhitinivartakadharmaratau ratirastumamavrajarajapatau. ||4||
॥ Iti Shayanarartikarya Samapta ॥
इस आरती का विशिष्ट महत्व
"शयनारार्तिकार्या" एक विशेष प्रकार की आरती है, जिसे 'शयन आरती' या 'पोढ्याची आरती' कहा जाता है। यह आरती दिन की अंतिम पूजा के रूप में, भगवान को शयन कराने (सुलाने) के लिए गाई जाती है। यह संस्कृत रचना, विशेषकर पुष्टिમાર્ગ (Pushtimarg) जैसी वैष्णव परंपराओं में बहुत महत्वपूर्ण है, जहाँ भगवान कृष्ण की सेवा एक जीवित बालक के रूप में की जाती है। यह आरती एक दिव्य लोरी (divine lullaby) की तरह है, जो भगवान के दिन भर की लीलाओं का स्मरण करती है और उनसे विश्राम करने का अनुरोध करती है। इसका भाव अत्यंत मधुर, प्रेमपूर्ण और वात्सल्य से भरा होता है। यह भक्त के दिन का एक शांतिपूर्ण समापन है, जहाँ वह अपने आराध्य को सुलाकर स्वयं भी उन्हीं के चरणों में विश्राम पाता है।
आरती के प्रमुख भाव और अर्थ
यह आरती भगवान कृष्ण के वात्सल्यपूर्ण और करुणामय स्वरूप का गुणगान करती है:
- शरणागतों पर दया (Compassion for the Surrendered): "शरणागतदीनदयैकपरे" - आरती की शुरुआत ही भगवान के सबसे प्रमुख गुण से होती है - वे उन दीनों और शरणागतों पर दया करने वाले हैं जिनका कोई और सहारा नहीं।
- गोपियों के प्रिय (Beloved of the Gopis): "करलालितघोषवधूहृदये" और "रतरञ्जितगोपवधूनिचये" - इन पंक्तियों में गोपियों (घोषवधू) के हृदय में बसने वाले और अपनी लीलाओं से उन्हें आनंदित करने वाले कृष्ण का स्मरण किया गया है। यह भगवान और उनके भक्तों के बीच के मधुर प्रेम संबंध (Madhurya Bhava) को दर्शाता है।
- पुण्यों का परम फल (The Ultimate Fruit of Merits): "चयसञ्चितपुण्यनिधानफले" - भगवान को भक्तों द्वारा संचित किए गए सभी पुण्यों का एकमात्र फल बताया गया है। इसका अर्थ है कि जीवन भर की साधना और अच्छे कर्मों का अंतिम लक्ष्य केवल भगवान की प्राप्ति ही है।
- व्रजराज से प्रेम की याचना (A Plea for Love towards the Lord of Vraja): "रतिरस्तुममव्रजराजपतौ" - आरती का समापन भक्त की इस विनम्र प्रार्थना के साथ होता है कि 'व्रज के राजा, श्री कृष्ण में मेरा प्रेम (रति) सदैव बना रहे।' यह दर्शाता है कि भक्त के लिए सबसे बड़ी अभिलाषा निरंतर भक्ति (constant devotion) ही है।
आरती करने की विधि और विशेष अवसर
- यह आरती प्रतिदिन रात्रि में, भगवान के मंदिर या घर के पूजा स्थल के पट बंद करने से ठीक पहले गाई जाती है।
- जन्माष्टमी और अन्य वैष्णव त्योहारों पर रात्रि जागरण के समापन पर इस आरती का गायन किया जाता है।
- आरती को शांत, मधुर और धीमी गति से गाना चाहिए, जैसे एक माँ अपने बच्चे को लोरी सुनाती है। इस दौरान तेज घंटानाद या वाद्ययंत्रों का प्रयोग नहीं किया जाता।
- इस आरती का पाठ करने से दिन भर के तनाव और चिंताओं से मुक्ति मिलती है, मन शांत होता है और एक गहरी, आरामदायक नींद (peaceful sleep) आती है, यह जानते हुए कि आप भगवान की दिव्य सुरक्षा में हैं।
