Logoपवित्र ग्रंथ

गंगामाईची आरती

Gangamai Chi Aarti (Marathi)

गंगामाईची आरती
माते दर्शनमात्रं प्राणी उद्धरिसी।
हरिसी पातक अवघे जग पावन करिसी॥
दुष्कर्मी मी रचिल्या पापांच्या राशी।
हर हर आतां स्मरतों मति होईल कैसी॥१॥

जय देवी जय देवी जय गंगाबाई।
पावन करि मज सत्वर विश्वाचे आई॥

पडले प्रसंग तैशी कर्मे आचरलों।
विषयांचे मोहानें त्यातचि रत झालों॥
त्याचे योगे दुष्कृत सिंधूत बुडालों।
त्यांतुनि मजला तारिसि ह्या हेतूनें आलों॥२॥

निर्दय यमदुत नेती त्या समयीं राखीं।
क्षाळीं यमधर्माच्या खात्यातील बाकी॥
मत्संगति जन अवघे तारियले त्वां की।
उरलो पाहें एकचि मी पतितांपैकी॥३॥

अघहरणे जय करुणे विनवितसे भावें।
नोपेक्षी मज आतां त्वत्पात्रीं घ्यावें॥
केला पदर पुढे मी मज इतकें द्यावें।
जीवे त्या विष्णूच्या परमात्मनि व्हावें॥४॥
॥ इति संपूर्णंम् ॥

इस आरती का विशिष्ट महत्व

"माते दर्शनमात्रं" यह आरती गंगा मैया (Ganga Mai), जिन्हें 'विश्वाची आई' (विश्व की माँ) कहा गया है, को समर्पित एक मार्मिक मराठी प्रार्थना है। यह आरती एक पापी भक्त की अपनी माँ गंगा से की गई करुण पुकार है। इसमें भक्त अपने द्वारा किए गए दुष्कर्मों को स्वीकार करता है और माँ गंगा की शरण में आकर उद्धार की याचना करता है। यह आरती गंगा जी के पतित-पावनी (पतितों को पवित्र करने वाली) स्वरूप और उनकी अपार करुणा पर अटूट विश्वास को दर्शाती है।

आरती के प्रमुख भाव और अर्थ

यह आरती एक भक्त के पश्चाताप और पूर्ण समर्पण के भावों को व्यक्त करती है:

  • दर्शन मात्र से उद्धार (Liberation by Mere Sight): "माते दर्शनमात्रं प्राणी उद्धरिसी। हरिसी पातक अवघे जग पावन करिसी॥" आरती की शुरुआत ही माँ गंगा की महिमा से होती है कि उनके दर्शन मात्र से ही प्राणियों का उद्धार हो जाता है और वे संपूर्ण जगत के पापों को हरकर उसे पवित्र (purify) कर देती हैं।
  • पापों की स्वीकारोक्ति (Confession of Sins): "दुष्कर्मी मी रचिल्या पापांच्या राशी।" भक्त अपने पापों के ढेर को स्वीकार करता है और "त्याचे योगे दुष्कृत सिंधूत बुडालों।" कहता है कि मैं अपने दुष्कर्मों के कारण पाप के सागर में डूब गया हूँ।
  • यमराज से रक्षा की प्रार्थना (Plea for Protection from Yama): "निर्दय यमदुत नेती त्या समयीं राखीं।" भक्त प्रार्थना करता है कि जब मृत्यु के समय निर्दयी यमदूत मुझे लेने आएं, तब हे माँ, तुम मेरी रक्षा करना।
  • परमात्मा में विलीन होने की कामना (Desire to Merge with the Supreme): "जीवे त्या विष्णूच्या परमात्मनि व्हावें॥" अंत में, भक्त अपनी अंतिम इच्छा व्यक्त करता है कि उसका जीवात्मा भगवान विष्णु के परमात्मा स्वरूप में विलीन हो जाए, जो मोक्ष (salvation) की सर्वोच्च अवस्था है।

आरती करने की विधि और विशेष अवसर

  • यह आरती विशेष रूप से गंगा दशहरा (Ganga Dussehra) और कार्तिक पूर्णिमा (Kartik Purnima) के दिन गंगा तट पर सायंकाल में की जाती है।
  • इसे घर पर भी दैनिक संध्या-आरती के समय गाया जा सकता है। पूजा में गंगाजल का प्रयोग करें।
  • माँ गंगा की तस्वीर के समक्ष या गंगा नदी की ओर मुख करके घी का दीपक जलाएं।
  • इस आरती को विनम्रता और पश्चाताप के भाव से गाना चाहिए। यह मन को शुद्ध करती है और पापों के नाश के लिए माँ गंगा की कृपा प्राप्त करने में सहायक होती है।
Back to aartis Collection