जय दिनकर जय भास्कर जय भग जय तरणे!।
तराणिस्त्वमसि तमसि जनिमृतिभवभयतरणे!॥
कर्मणि सतां प्रवृत्तिं प्रकरोषि च वृष्टिं।
किं च ददास्यन्धानामिव जगतां दृष्टिं॥
पास्यनलस एव परिभ्रमणपरः सृष्टिं।
मन्ये लोकं वरसं त्वां भगवन्! गृष्टिम्॥१॥
जगदालयदीपस्त्वं चक्षुर्लोकानां।
दुःसहविरहमहार्तेरङ्गदः कोकानां॥
हेतुर्मन्देहासुरसेनाशोकानां।
तव भाम्बुरुहां सुखदारणिरिव तोकानाम्॥२॥
किम्बहुना स्तवमकं ब्रूमस्तव सारं।
कुरुते पुरतस्तेंऽजलिमजयद्यो मारं॥
त्वं खलु सद्गतिभाजामार्याणां द्वारं।
मुदिर इव मयूरकुलं सुखयसि सेद्वारम्॥३॥
॥ इति श्रीरामनन्दनमयूरेश्वरकृतं दिनकरार्तिक्यं सम्पूर्णम् ॥
तराणिस्त्वमसि तमसि जनिमृतिभवभयतरणे!॥
कर्मणि सतां प्रवृत्तिं प्रकरोषि च वृष्टिं।
किं च ददास्यन्धानामिव जगतां दृष्टिं॥
पास्यनलस एव परिभ्रमणपरः सृष्टिं।
मन्ये लोकं वरसं त्वां भगवन्! गृष्टिम्॥१॥
जगदालयदीपस्त्वं चक्षुर्लोकानां।
दुःसहविरहमहार्तेरङ्गदः कोकानां॥
हेतुर्मन्देहासुरसेनाशोकानां।
तव भाम्बुरुहां सुखदारणिरिव तोकानाम्॥२॥
किम्बहुना स्तवमकं ब्रूमस्तव सारं।
कुरुते पुरतस्तेंऽजलिमजयद्यो मारं॥
त्वं खलु सद्गतिभाजामार्याणां द्वारं।
मुदिर इव मयूरकुलं सुखयसि सेद्वारम्॥३॥
॥ इति श्रीरामनन्दनमयूरेश्वरकृतं दिनकरार्तिक्यं सम्पूर्णम् ॥
Jai Dinakara Jai Bhaskara Jai Bhaga Jai Tarane!,
Taranistvamasi Tamasi Janimritibhavabhayatarane!. ||
Karmani Satam Pravrittim Prakaroshi Cha Vrishtim,
Kim Cha Dadasi Andhanamiva Jagatam Drishtim. ||
Pasyanalasa Eva Paribhramanaparah Srishtim,
Manye Lokam Varasam Tvam Bhagavan! Grishtim. ||1||
Jagadalayadipastvam Chakshurlokanam,
Duhsahavirahamaharterangadah Kokanam. ||
Heturmandehasurasenashokanam,
Tava Bhamburuham Sukhadaraniriva Tokanam. ||2||
Kimbahuna Stavamakam Brumastava Saram,
Kurute Puratastenjalimajayadyo Maram. ||
Tvam Khalu Sadgatibhajamaryanam Dvaram,
Mudira Iva Mayurakulam Sukhayasi Sedvaram. ||3||
॥ Iti Shriramanandanamayureshvarakritam Dinakarartikyam Sampurnam ॥
Taranistvamasi Tamasi Janimritibhavabhayatarane!. ||
Karmani Satam Pravrittim Prakaroshi Cha Vrishtim,
Kim Cha Dadasi Andhanamiva Jagatam Drishtim. ||
Pasyanalasa Eva Paribhramanaparah Srishtim,
Manye Lokam Varasam Tvam Bhagavan! Grishtim. ||1||
Jagadalayadipastvam Chakshurlokanam,
Duhsahavirahamaharterangadah Kokanam. ||
Heturmandehasurasenashokanam,
Tava Bhamburuham Sukhadaraniriva Tokanam. ||2||
Kimbahuna Stavamakam Brumastava Saram,
Kurute Puratastenjalimajayadyo Maram. ||
Tvam Khalu Sadgatibhajamaryanam Dvaram,
Mudira Iva Mayurakulam Sukhayasi Sedvaram. ||3||
॥ Iti Shriramanandanamayureshvarakritam Dinakarartikyam Sampurnam ॥
इस आरती का विशिष्ट महत्व
'दिनकरार्तिक्यम्' भगवान सूर्य देव की एक अत्यंत काव्यात्मक और दार्शनिक संस्कृत आरती है। इसका शीर्षक दो शब्दों से मिलकर बना है - 'दिनकर' (दिन करने वाले, अर्थात सूर्य) और 'आर्तिक्यम्' (आरती)। इस आरती की रचना श्री रामानंदन के पुत्र, कवि मयूरेश्वर (Poet Mayureshvar) ने की थी, जैसा कि अंतिम पंक्ति में उल्लेख है। यह आरती सूर्य देव के विभिन्न नामों जैसे दिनकर, भास्कर, भग और तरणि का जयगान करती है और उनके लौकिक एवं आध्यात्मिक महत्व को उजागर करती है। यह केवल एक स्तुति नहीं, बल्कि सूर्य देव के प्रति एक गहन दार्शनिक चिंतन भी है।
आरती के प्रमुख भाव और अर्थ
यह संस्कृत आरती सूर्य देव के गुणों का बहुत ही सुंदर वर्णन करती है:
- जन्म-मृत्यु के भय से तारने वाले (Savior from Fear of Birth and Death): "तराणिस्त्वमसि तमसि जनिमृतिभवभयतरणे!" - हे सूर्य देव! आप जन्म-मृत्यु के अंधकार और भय रूपी सागर को पार कराने के लिए एक नौका (boat) के समान हैं।
- जगत के नेत्र (The Eyes of the World): "ददास्यन्धानामिव जगतां दृष्टिं।" तथा "चक्षुर्लोकानां।" - आप इस संसार को दृष्टि (vision) प्रदान करते हैं, मानो अंधे को आँखें दे रहे हों। आप ही इस जगत रूपी आलय के दीपक और लोगों के नेत्र हैं।
- सर्व-पूजनीय (Worshipped by All): "कुरुते पुरतस्तेंऽजलिमजयद्यो मारं॥" - जिन्होंने कामदेव (मार) को भी जीत लिया (अर्थात भगवान शिव), वे भी आपके समक्ष हाथ जोड़कर खड़े होते हैं। यह आपकी सर्वोच्चता को दर्शाता है।
- सद्गति का द्वार (Gateway to Salvation): "त्वं खलु सद्गतिभाजामार्याणां द्वारं।" - आप निश्चित रूप से सद्गति प्राप्त करने वाले श्रेष्ठ पुरुषों के लिए मोक्ष का द्वार (gateway to salvation) हैं।
आरती करने की विधि और विशेष अवसर
- यह आरती सूर्योदय (sunrise) के समय करने के लिए सर्वोत्तम है, विशेषकर रविवार (Sunday) को।
- प्रातःकाल स्नान के बाद, सूर्य देव को तांबे के पात्र से अर्घ्य (Arghya) दें। उसके बाद पूर्व दिशा की ओर मुख करके इस संस्कृत आरती का शुद्ध उच्चारण के साथ पाठ करें।
- मकर संक्रांति (Makar Sankranti) और छठ पूजा (Chhath Puja) जैसे सूर्य-संबंधी पर्वों पर इसका पाठ करना विशेष फलदायी होता है।
- इस आरती का पाठ करने से न केवल अच्छा स्वास्थ्य (good health) और तेजस्विता प्राप्त होती है, बल्कि यह आध्यात्मिक ज्ञान और मोक्ष का मार्ग भी प्रशस्त करती है।
