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देवीनीराजनम्

Devi Nirajanam (Sanskrit Aarti)

देवीनीराजनम्
जय देवि जय देवि जयमातस्त्रिपुरे।
भक्त्यानुग्रहकारिणि दासानुग्रहकारिणि ईश्वरि सुरवरदे॥

दुर्गे दुर्गतिनाशिनि भवसागरतारे
मृगेन्द्रवाहनगिरिजे दानवसंहारे।
अष्टादशभुजमूर्ते कण्ठरूण्डमाले
सप्तशृङ्गनिवासिनि रुद्रात्मकशक्ते॥१॥

बालार्कारुणशोभितबन्धक कुसुमाभे
कुङ्कुमशोभितदेहे दाडिमकुसुमाभे।
पादाहतमहिषासुरदेवासुरसर्गे
नानादानवमर्दिनि अलिकुलरिपुवर्गे॥२॥

जय त्रिपुरासुरमर्दिनि मर्दय मम दोषान्
तारय तारय मातर्भवजलकूपस्थान्।
कामक्रोधादीन्मारय देहस्थान्
करुणादृष्ट्या माता रक्षय निजभक्तान्॥३॥

मूले चाधिष्ठाने मणिपूरे चक्रे
हृदयेऽनाहतचक्रे षोडशदलपद्मे।
आज्ञाचक्रे बालय बालय कृतवलये
ब्रह्मस्थाने विहरसि मातः शिवसहिते॥४॥

विधिहरिशङ्करवन्द्ये पण्डितजनवन्द्ये
सनकादिकमुनिवन्द्ये यक्षासुरवन्द्ये।
नारदतुम्बुरुकिन्नरगीते सुरवन्द्ये
अघनाशिनि भवशोषिणि मातः सुखसहिते॥५॥

ॐ कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम्।
सदा रमन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि॥
॥ इति देवीनीराजनं सम्पूर्णम् ॥

इस आरती का विशिष्ट महत्व

'देवीनीराजनम्' एक अत्यंत शक्तिशाली और गहन संस्कृत आरती है जो आदिशक्ति के विभिन्न स्वरूपों की वंदना करती है। 'नीराजनम्' आरती का ही संस्कृत पर्याय है। यह स्तुति विशेष रूप से देवी के त्रिपुरसुंदरी (Tripura Sundari) और दुर्गा (Durga) स्वरूपों का आह्वान करती है। इस आरती की सबसे अनूठी विशेषता यह है कि इसमें तांत्रिक और यौगिक परंपरा का समावेश है, जहाँ देवी को शरीर के विभिन्न ऊर्जा-चक्रों (energy chakras) - मूलाधार, मणिपूर, अनाहत, आज्ञा और ब्रह्मस्थान (सहस्रार) - में निवास करने वाली शक्ति के रूप में वर्णित किया गया है। यह आरती देवी को केवल बाहरी शक्ति ही नहीं, बल्कि भीतर की कुंडलिनी शक्ति (Kundalini Shakti) के रूप में भी पूजती है।

आरती के प्रमुख भाव और अर्थ

यह आरती देवी के बाह्य और आंतरिक, दोनों स्वरूपों का स्तवन करती है:

  • सर्वशक्तिमान स्वरूप (The Omnipotent Form): "दुर्गे दुर्गतिनाशिनि... अष्टादशभुजमूर्ते।" इसमें उन्हें दुर्गति का नाश करने वाली, सिंहवाहिनी, अठारह भुजाओं वाली और दानवों का संहार करने वाली दुर्गा के रूप में वंदन किया गया है।
  • आंतरिक शक्ति-केंद्र (Internal Energy Centers): "मूले चाधिष्ठाने मणिपूरे चक्रे... ब्रह्मस्थाने विहरसि मातः शिवसहिते॥" यह दुर्लभ वर्णन देवी को मूलाधार से लेकर सहस्रार चक्र तक की यात्रा करने वाली कुंडलिनी शक्ति के रूप में देखता है, जो अंत में शिव के साथ एकाकार हो जाती हैं।
  • आंतरिक शत्रुओं का नाश (Destroyer of Inner Enemies): "कामक्रोधादीन्मारय देहस्थान्।" भक्त देवी से केवल बाहरी शत्रुओं को ही नहीं, बल्कि शरीर के भीतर स्थित काम, क्रोध, लोभ जैसे आंतरिक शत्रुओं (inner enemies) का भी नाश करने की प्रार्थना करता है।
  • सर्व-पूजित (Worshipped by All): "विधिहरिशङ्करवन्द्ये पण्डितजनवन्द्ये।" ब्रह्मा, विष्णु, शंकर से लेकर पंडित, मुनि, यक्ष और किन्नर तक, सभी उनकी वंदना करते हैं, जो उनकी सार्वभौमिक महिमा को दर्शाता है।

आरती करने की विधि और विशेष अवसर

  • यह आरती नवरात्रि (Navratri) के दिनों, विशेषकर दुर्गाष्टमी और महानवमी पर, संध्या आरती के समय गाने के लिए अत्यंत उपयुक्त है।
  • जो साधक ध्यान और योग (meditation and yoga) का अभ्यास करते हैं, उनके लिए यह आरती कुंडलिनी जागरण में सहायक हो सकती है।
  • देवी की प्रतिमा के समक्ष घी का दीपक और कपूर जलाएं। उन्हें लाल पुष्प, विशेषकर गुड़हल, अर्पित करें।
  • संस्कृत के श्लोकों का शुद्ध उच्चारण करते हुए, शांत और एकाग्र मन से इस आरती का पाठ करें। यह मन को शुद्ध करती है और आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार करती है।
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