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आरती भुवनसुंदराची

Aarti Bhuvanasundarachi (Marathi)

आरती भुवनसुंदराची
आरती भुवनसुंदराची। इंदिरावरा मुकुंदाची॥

पद्मसम पादयुग्मरंगा। ओंवाळणी होति भृंगा॥
नखमणि श्रवताहे गंगा। जे कां त्रिविधतापभंगा॥१॥

पीतपट हाटकतप्तवर्णी। कांची नितंबसुस्थानीं॥
नाभिची अगाध हो करणी। विश्वजनकाची जे जननी॥२॥

इंदुसम आस्य कुंदरदना। अधरारुणार्कबिंबवदना॥
पाहतां भ्रांति पडे मदना। सजलमेयब्धि दैत्यदमना॥३॥

कल्पद्रुमातळीं मूर्ती। सौदामिनी कोटिदिप्ती॥
गोपीगोपवलयभंवती। त्रिविष्टप पुष्पवृष्टि करिती॥४॥

वृंदावनिंचे विहरणि। सखे गे कृष्णमायबहिणी॥
श्रमलों भवाभ्धिचे फिरणीं। आतां मज ठाव देई चरणीं॥५॥
॥ इति संपूर्णंम् ॥

इस आरती का विशिष्ट महत्व

"आरती भुवनसुंदराची" एक सुंदर मराठी आरती है जो भगवान श्री कृष्ण के 'भुवनसुंदर' (Bhuvanasundar) स्वरूप को समर्पित है, जिसका अर्थ है 'तीनों लोकों में सबसे सुंदर'। इस आरती में उन्हें 'इंदिरावरा मुकुंदाची' भी कहा गया है, अर्थात वे देवी इंदिरा (लक्ष्मी) के पति मुकुंद (श्री कृष्ण) हैं। यह आरती उनके दिव्य और मनमोहक रूप का 'नख-शिख' (पैरों के नाखून से लेकर सिर के शिखर तक) वर्णन करती है। यह उनके प्रत्येक अंग की सुंदरता और दिव्यता का गुणगान करती है, जिसे देखकर कामदेव भी मोहित हो जाते हैं।

आरती के प्रमुख भाव और अर्थ

यह आरती भगवान कृष्ण के अलौकिक सौंदर्य का काव्यात्मक चित्रण करती है:

  • चरण-कमल की वंदना (Adoration of the Lotus Feet): "पद्मसम पादयुग्मरंगा... नखमणि श्रवताहे गंगा।" आरती का आरंभ उनके कमल-समान चरणों के वर्णन से होता है, जिनके नाखूनों की कांति से ही मानो गंगा बह रही हो, जो तीनों तापों (दैहिक, दैविक, भौतिक) का नाश करती है।
  • दिव्य पीताम्बर और आभूषण (Divine Attire and Ornaments): "पीतपट हाटकतप्तवर्णी। कांची नितंबसुस्थानीं॥" यह उनके सोने के समान चमकते पीताम्बर और कमर में बंधी हुई सुंदर करधनी का वर्णन है।
  • मनमोहक मुखारविंद (Enchanting Face): "इंदुसम आस्य कुंदरदना। अधरारुणार्कबिंबवदना॥" उनका मुख चंद्रमा के समान और होंठ सूर्य-बिम्ब के समान लाल हैं, जिनकी सुंदरता को देखकर कामदेव को भी भ्रांति हो जाती है।
  • भक्त की अंतिम प्रार्थना (The Devotee's Final Plea): "श्रमलों भवाभ्धिचे फिरणीं। आतां मज ठाव देई चरणीं॥" अंत में, भक्त कहता है कि मैं इस भवसागर (ocean of existence) में भटकते-भटकते थक गया हूँ, अब मुझे अपने चरणों में स्थान दें।

आरती करने की विधि और विशेष अवसर

  • यह आरती विशेष रूप से जन्माष्टमी (Janmashtami) और एकादशी (Ekadashi) के दिन गाई जाती है। इसे दैनिक पूजा में भी गाया जा सकता है।
  • भगवान श्री कृष्ण की प्रतिमा के समक्ष घी का दीपक जलाकर और उन्हें तुलसी दल तथा माखन-मिश्री का भोग लगाकर इस आरती का पाठ करना चाहिए।
  • यह आरती ध्यान (meditation) के लिए बहुत उपयुक्त है, क्योंकि यह भक्त को भगवान के सुंदर स्वरूप पर मन को केंद्रित करने में मदद करती है।
  • इस आरती का प्रेमपूर्वक गायन करने से मन को शांति मिलती है और भगवान कृष्ण के प्रति भक्ति भाव दृढ़ होता है।
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