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श्री युगल किशोर की आरती

Shri Yugal Kishor Ki Aarti (Aarti Jugal Kisor Ki)

श्री युगल किशोर की आरती
आरति जुगलकिसोरकी कीजै, तन मन धन न्योछावर कीजै॥
गौर श्याम मुख निरखन कीजै, प्रेम स्वरूप नयन भर पीजै॥
रबि ससि कोटि बदनकी सोभा, ताहि देखि मेरो मन लोभा॥
मोर मुकुट सिर मुरली सोहै, नटवर वेष निरख मन मोहै॥
ओढ़े पीत नील पट सारी, कुंजन ललना-लाल-बिहारी॥
श्रीपुरुषोत्तम गिरिबरधारी, आरति करत सकल ब्रजनारी॥
नंदनंदन वृषभानु-किसोरी, परमानंद प्रभु अबिचल जोरी॥
॥ इति संपूर्णंम् ॥

इस आरती का विशिष्ट महत्व

"आरति जुगलकिसोरकी कीजै" भगवान श्री राधा-कृष्ण के 'युगल किशोर' (Yugal Kishor), अर्थात 'दिव्य युवा जोड़ी' के स्वरूप को समर्पित है। यह आरती उनके अविभाज्य, प्रेममय और नित्य-नवीन स्वरूप की वंदना है। इस आरती में भक्त अपने आराध्य के युगल स्वरूप पर अपना तन, मन और धन सब कुछ न्योछावर करने का भाव रखता है। यह आरती विशेष रूप से पुष्टिमार्ग और गौड़ीय वैष्णव संप्रदायों में बहुत लोकप्रिय है, जहाँ राधा-कृष्ण के माधुर्य भाव की भक्ति को सर्वोच्च माना जाता है।

आरती के प्रमुख भाव और अर्थ

यह आरती श्री राधा-कृष्ण के युगल सौंदर्य और उनके प्रति भक्त के समर्पण को दर्शाती है:

  • सर्वस्व समर्पण (Complete Surrender): "तन मन धन न्योछावर कीजै।" आरती की पहली पंक्ति ही भक्त के पूर्ण समर्पण के भाव को व्यक्त करती है, जहाँ वह अपना सब कुछ अपने आराध्य के चरणों में अर्पित कर देता है।
  • दिव्य सौंदर्य का पान (Drinking the Divine Beauty): "गौर श्याम मुख निरखन कीजै, प्रेम स्वरूप नयन भर पीजै॥" भक्त राधा जी के गौर वर्ण और श्यामसुंदर के श्याम वर्ण के मुखारविंद को निहारकर, उनके प्रेम-स्वरूप को अपने नेत्रों से पीने की अभिलाषा रखता है।
  • अतुलनीय शोभा (Incomparable Splendor): "रबि ससि कोटि बदनकी सोभा, ताहि देखि मेरो मन लोभा॥" उनके युगल स्वरूप की शोभा करोड़ों सूर्य (रवि) और चंद्रमा (शशि) से भी बढ़कर है, जिसे देखकर भक्त का मन मोहित हो जाता है।
  • अविचल जोड़ी (The Eternal Couple): "नंदनंदन वृषभानु-किसोरी, परमानंद प्रभु अबिचल जोरी॥" यह अंतिम पंक्ति नंद के पुत्र कृष्ण और वृषभानु की पुत्री राधा की 'अविचल' अर्थात शाश्वत और अटूट जोड़ी का जयगान करती है, जो परमानंद का स्रोत है।

आरती करने की विधि और विशेष अवसर

  • यह आरती विशेष रूप से जन्माष्टमी (Janmashtami) और राधाष्टमी (Radhashtami) के उत्सवों पर गाई जाती है।
  • इसे नित्य संध्या आरती में, विशेषकर एकादशी (Ekadashi) और पूर्णिमा (Purnima) के दिन, गाना बहुत शुभ माना जाता है।
  • पूजा स्थान पर श्री राधा-कृष्ण का युगल विग्रह या चित्र स्थापित करें। उन्हें सुगंधित पुष्प, विशेषकर गुलाब और कमल, अर्पित करें।
  • घी का दीपक जलाकर, प्रेम और समर्पण के भाव से इस आरती का गायन करें। यह आरती मन को शांति और युगल सरकार के चरणों में दृढ़ भक्ति प्रदान करती है।
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