हरि कर दीपक, बजावैं संख सुरपति,
गनपति झाँझ, भैरौं झालर झरत हैं।
नारदके कर बीन, सारदा गावत जस,
चारिमुख चारि बेद बिधि उचरत हैं॥
घटमुख रटत सहस्रमुख सिव सिव,
सनक-सनंददि पाँवन परत हैं।
'बालकृष्ण' तीनो लोक, तीस और तीनो कोटि,
एते शिव-शंकरकी आरति करत हैं॥
॥ इति संपूर्णंम् ॥
गनपति झाँझ, भैरौं झालर झरत हैं।
नारदके कर बीन, सारदा गावत जस,
चारिमुख चारि बेद बिधि उचरत हैं॥
घटमुख रटत सहस्रमुख सिव सिव,
सनक-सनंददि पाँवन परत हैं।
'बालकृष्ण' तीनो लोक, तीस और तीनो कोटि,
एते शिव-शंकरकी आरति करत हैं॥
॥ इति संपूर्णंम् ॥
Hari Kar Deepak, Bajavain Sankh Surapati,
Ganpati Jhanjh, Bhairon Jhalar Jharat Hain.
Narad Ke Kar Been, Sarada Gavat Jas,
Charimukh Chari Ved Bidhi Ucharat Hain. ||
Ghatmukh Ratat Sahasramukh Shiv Shiv,
Sanak-Sanandadi Panvan Parat Hain.
'Balakrishna' Teeno Lok, Tees Aur Teeno Koti,
Ete Shiv-Shankar Ki Aarti Karat Hain. ||
॥ Iti Sampurnam ॥
Ganpati Jhanjh, Bhairon Jhalar Jharat Hain.
Narad Ke Kar Been, Sarada Gavat Jas,
Charimukh Chari Ved Bidhi Ucharat Hain. ||
Ghatmukh Ratat Sahasramukh Shiv Shiv,
Sanak-Sanandadi Panvan Parat Hain.
'Balakrishna' Teeno Lok, Tees Aur Teeno Koti,
Ete Shiv-Shankar Ki Aarti Karat Hain. ||
॥ Iti Sampurnam ॥
इस आरती का विशिष्ट महत्व
"हरि कर दीपक" भगवान शिव शंकर को समर्पित एक बहुत ही अनूठी और अद्भुत आरती है। इसकी विशिष्टता इस बात में है कि यह भक्त द्वारा की जाने वाली आरती का वर्णन नहीं करती, बल्कि यह उस भव्य और दिव्य आरती का चित्रण करती है जो स्वयं त्रिदेव और समस्त देवगण मिलकर भगवान शिव के लिए कर रहे हैं। यह आरती शिव की सर्वोच्चता और उनके 'महादेव' (देवों के देव) होने की सार्थकता को दर्शाती है। इस आरती के रचयिता भक्त कवि 'बालकृष्ण' (Balkrishna) हैं, जिनका नाम अंतिम पंक्ति में आता है।
आरती के प्रमुख भाव और अर्थ
यह आरती एक भव्य दिव्य आयोजन का शब्द-चित्र प्रस्तुत करती है:
- देवताओं द्वारा आरती (Aarti by the Gods): "हरि कर दीपक, बजावैं संख सुरपति।" इस पंक्ति में स्वयं भगवान विष्णु (हरि) दीपक लिए हुए हैं और देवराज इंद्र (सुरपति) शंख बजा रहे हैं। यह दृश्य भगवान शिव की महिमा को दर्शाता है, जिनकी आरती स्वयं विष्णु और इंद्र कर रहे हैं।
- दिव्य संगीत मंडली (The Divine Orchestra): "गनपति झाँझ, भैरौं झालर झरत हैं। नारदके कर बीन, सारदा गावत जस..." इस आरती में गणपति जी झांझ बजा रहे हैं, भैरव जी झालर, नारद जी वीणा बजा रहे हैं और माँ सरस्वती यश का गान कर रही हैं। यहाँ तक कि ब्रह्मा जी चारों वेदों का उच्चारण कर रहे हैं।
- समस्त सृष्टि द्वारा वंदना (Adoration by the Entire Creation): "घटमुख रटत सहस्रमुख सिव सिव," और "'बालकृष्ण' तीनो लोक, तीस और तीनो कोटि, एते शिव-शंकरकी आरति करत हैं॥" यहाँ कहा गया है कि कार्तिकेय (घटमुख) और शेषनाग (सहस्रमुख) से लेकर तीनों लोकों के तैंतीस कोटि देवी-देवता, सभी मिलकर भगवान शिव की आरती कर रहे हैं।
आरती करने की विधि और विशेष अवसर
- यह आरती महाशिवरात्रि (Mahashivratri) और सावन के सोमवार (Sawan Somvar) पर संध्या-आरती के समय गाने के लिए विशेष रूप से उपयुक्त है।
- इस आरती का पाठ करते समय भक्त को मन में यह कल्पना करनी चाहिए कि वह अकेला नहीं, बल्कि समस्त देवगणों के साथ मिलकर महादेव की आरती कर रहा है।
- भगवान शिव के समक्ष दीपक जलाएं और इस आरती का भक्तिपूर्वक गायन करें। यह आरती मन में शिव की महानता का भाव जगाती है और अहंकार को नष्ट करती है।
- इसका पाठ करने से साधक को यह अनुभूति होती है कि वह उस परम सत्ता का अंश है जिसकी वंदना संपूर्ण ब्रह्मांड करता है।
