करत आरती नवब्रजनारी।
अगर कपूर सुगंधित बूका, बिबिध भाँति की साँझा सँवारी॥
घंटा झालर शंख नृसिंघा, बिजै घंट धुनि परम सुखारी।
बंशी बीन मृदंग तँबूरा, सहनाई बाजत है न्यारी॥
बरसत फूल गगनसों सुरगन, देवबधू नाचत दै तारी।
हरषत सखी करत न्योछावर, नारायण होवैं बलिहारी॥
॥ इति संपूर्णंम् ॥
अगर कपूर सुगंधित बूका, बिबिध भाँति की साँझा सँवारी॥
घंटा झालर शंख नृसिंघा, बिजै घंट धुनि परम सुखारी।
बंशी बीन मृदंग तँबूरा, सहनाई बाजत है न्यारी॥
बरसत फूल गगनसों सुरगन, देवबधू नाचत दै तारी।
हरषत सखी करत न्योछावर, नारायण होवैं बलिहारी॥
॥ इति संपूर्णंम् ॥
Karat Aarti Navbrajnari.
Agar Kapoor Sugandhit Buka, Bibidh Bhanti Ki Sanjha Sanvari. ||
Ghanta Jhalar Shankh Nrisingha, Bijai Ghant Dhuni Param Sukhari.
Vanshi Been Mridang Tanbura, Shahnai Bajata Hai Nyari. ||
Barsat Phool Gaganson Surgan, Devbadhu Nachat Dai Tari.
Harshat Sakhi Karat Nyochhavar, Narayan Hoven Balihari. ||
॥ Iti Sampurnam ॥
Agar Kapoor Sugandhit Buka, Bibidh Bhanti Ki Sanjha Sanvari. ||
Ghanta Jhalar Shankh Nrisingha, Bijai Ghant Dhuni Param Sukhari.
Vanshi Been Mridang Tanbura, Shahnai Bajata Hai Nyari. ||
Barsat Phool Gaganson Surgan, Devbadhu Nachat Dai Tari.
Harshat Sakhi Karat Nyochhavar, Narayan Hoven Balihari. ||
॥ Iti Sampurnam ॥
इस आरती का विशिष्ट महत्व
"करत आरती नवब्रजनारी" भगवान श्री कृष्ण के 'व्रजनंदन' (Vrajnandan) स्वरूप को समर्पित एक अत्यंत मधुर आरती है। 'व्रजनंदन' का अर्थ है 'व्रज को आनंद देने वाले'। यह आरती उस दिव्य दृश्य का चित्रण करती है जहाँ व्रज की नव-यौवना गोपियाँ (Gopis) अपने प्रियतम श्री कृष्ण की आरती उतार रही हैं। यह आरती भक्ति के 'माधुर्य भाव' (sweetest form of devotional love) का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जहाँ भक्त और भगवान के बीच सखा और प्रियतम का संबंध होता है। इस आरती में किसी मांग या वरदान की याचना नहीं है, बल्कि यह केवल प्रेम और समर्पण का एक उत्सव है, जिसमें देवता भी आकाश से पुष्प वर्षा कर सम्मिलित हो रहे हैं।
आरती के प्रमुख भाव और अर्थ
यह आरती एक उत्सवपूर्ण और प्रेममयी वातावरण का सुंदर चित्रण करती है:
- गोपियों द्वारा प्रेमपूर्ण पूजा (Loving Worship by the Gopis): "करत आरती नवब्रजनारी।" आरती का आरंभ ही गोपियों द्वारा की जा रही प्रेमपूर्ण आरती से होता है, जिसमें अगर, कपूर और अन्य सुगंधित पदार्थों का प्रयोग हो रहा है।
- दिव्य संगीत और वातावरण (Divine Music and Atmosphere): "घंटा झालर शंख नृसिंघा... बंशी बीन मृदंग तँबूरा।" यह पंक्तियाँ उस संगीतमय वातावरण का वर्णन करती हैं जहाँ विभिन्न प्रकार के वाद्ययंत्र बज रहे हैं, जो आरती को और भी आनंदमय बना रहे हैं।
- स्वर्गीय उत्सव (Celestial Celebration): "बरसत फूल गगनसों सुरगन, देवबधू नाचत दै तारी।" इस प्रेममयी आरती को देखकर स्वर्ग से देवतागण पुष्प वर्षा कर रहे हैं और अप्सराएं (celestial maidens) तालियां बजाकर नृत्य कर रही हैं, जो इस दृश्य की दिव्यता को दर्शाता है।
- पूर्ण समर्पण का भाव (The Feeling of Complete Surrender): "हरषत सखी करत न्योछावर, नारायण होवैं बलिहारी॥" सभी सखियाँ (गोपियाँ) अत्यधिक प्रसन्न होकर श्री कृष्ण पर अपना सर्वस्व न्योछावर कर रही हैं और उन पर बलिहारी जा रही हैं। यह भक्ति में पूर्ण समर्पण का प्रतीक है।
आरती करने की विधि और विशेष अवसर
- यह आरती विशेष रूप से जन्माष्टमी (Janmashtami), राधाष्टमी (Radhashtami) और शरद पूर्णिमा (Sharad Purnima) जैसे रास-लीला से जुड़े उत्सवों पर गाई जाती है।
- इसे नित्य संध्या आरती में भी गाया जा सकता है, जिससे घर में प्रेम और आनंद का वातावरण बनता है।
- भगवान श्री कृष्ण की प्रतिमा के समक्ष घी का दीपक जलाएं और उन्हें सुगन्धित पुष्प अर्पित करें।
- इस आरती को गाते समय स्वयं को व्रज की एक गोपी मानकर, पूर्ण प्रेम और उल्लास के साथ नृत्य करते हुए गाने से विशेष आनंद की अनुभूति होती है।
