Logoपवित्र ग्रंथ

श्री गणेश जी की आरती

Shree Ganesh Ji Ki Aarti (Aarti Gajavadan Vinayak Ki)

श्री गणेश जी की आरती
आरति गजवदन विनायककी।
सुर-मुनि-पूजित गणनायककी॥

एकदंत शशिभाल गजानन,
विघ्नविनाशक शुभगुण कानन,
शिवसुत वन्द्यमान-चतुरानन,
दुःखविनाशक सुखदायककी॥

ऋद्धि-सिद्धि-स्वामी समर्थ अति,
विमल बुद्धि दाता सुविमल-मति,
अघ-वन-दहन, अमल अबिगत गति,
विद्या-विनय-विभव-दायककी॥

पिङ्गलनयन, विशाल शुंडधर,
धूम्रवर्ण शुचि वज्रांकुश-कर,
लम्बोदर बाधा-विपत्ति-हर,
सुर-वन्दित सब विधि लायककी॥
॥ इति संपूर्णंम् ॥

इस आरती का विशिष्ट महत्व

"आरति गजवदन विनायककी" भगवान गणेश को समर्पित एक और सुंदर और सारगर्भित आरती है। यह आरती उनके विभिन्न नामों और गुणों का स्तवन करती है, जो उनके स्वरूप और शक्तियों को दर्शाते हैं। 'गजवदन' (Gajavadan) का अर्थ है 'हाथी के मुख वाले' और 'विनायक' (Vinayak) का अर्थ है 'नायकों के नायक' या 'सर्वोच्च मार्गदर्शक'। यह आरती विशेष रूप से उनके विघ्नहर्ता और बुद्धि-प्रदाता स्वरूप पर ध्यान केंद्रित करती है, जिससे यह छात्रों, व्यापारियों और किसी भी नए कार्य का शुभारंभ करने वालों के लिए अत्यंत फलदायी है।

आरती के प्रमुख भाव और अर्थ

यह आरती भगवान गणेश के गुणों का संक्षिप्त और प्रभावशाली वर्णन करती है:

  • विघ्नहर्ता और सुखकर्ता (Remover of Obstacles and Giver of Happiness): "विघ्नविनाशक शुभगुण कानन," और "दुःखविनाशक सुखदायककी॥" ये पंक्तियाँ उनके मुख्य गुण को उजागर करती हैं - वे सभी बाधाओं (obstacles) को नष्ट करने वाले और दुखों को दूर करके सुख प्रदान करने वाले हैं।
  • ऋद्धि-सिद्धि के स्वामी (Lord of Prosperity and Accomplishment): "ऋद्धि-सिद्धि-स्वामी समर्थ अति।" भगवान गणेश को ऋद्धि (भौतिक समृद्धि) और सिद्धि (आध्यात्मिक उपलब्धि) का स्वामी माना जाता है, जो भक्तों को दोनों क्षेत्रों में सफलता प्रदान करते हैं।
  • विद्या और विनय के दाता (Giver of Knowledge and Humility): "विमल बुद्धि दाता सुविमल-मति," और "विद्या-विनय-विभव-दायककी॥" उनकी उपासना से निर्मल बुद्धि, विद्या (knowledge), विनय (humility) और वैभव (splendor) की प्राप्ति होती है।
  • दिव्य स्वरूप का वर्णन (Description of Divine Form): "पिङ्गलनयन, विशाल शुंडधर, धूम्रवर्ण... लम्बोदर।" यह आरती उनके विशिष्ट स्वरूप का वर्णन करती है, जैसे उनके पिंगल नेत्र, विशाल सूंड, धुएं जैसा वर्ण और लम्बा उदर, जो संपूर्ण ब्रह्मांड को समाहित किए हुए है।

आरती करने की विधि और विशेष अवसर

  • यह आरती किसी भी पूजा या शुभ कार्य के आरंभ में गाई जा सकती है। बुधवार (Wednesday) और गणेश चतुर्थी (Ganesh Chaturthi) के दिन इसका पाठ करना विशेष फलदायी होता है।
  • पूजा की थाली में दीपक, कपूर, और दूर्वा (durva grass) अवश्य रखें, क्योंकि दूर्वा भगवान गणेश को अत्यंत प्रिय है।
  • उन्हें मोदक या लड्डू का भोग लगाएं और फिर पूरे परिवार के साथ मिलकर घंटी बजाते हुए इस आरती का गायन करें।
  • आरती के बाद, भगवान गणेश से अपने मार्ग की सभी बाधाओं को दूर करने और कार्य में सफलता प्रदान करने की प्रार्थना करें।
Back to aartis Collection