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श्री राधिकानाथ की आरती

Shri Radhikanath Ki Aarti

श्री राधिकानाथ की आरती
आरती वारत राधिका नागरी।
तन कनक थार, भूषन रलदीपक लिएँ,
कमल मुक्तावली मंगल उजगारी॥

रुपित कटि मेखला सुभग घंटावली।
झालर संख बजात जे करत उच्चारी॥

अनुराग छत्र अंचल चमर नयन चल
भाव कुसुमांजलि चतुर गुन आगरी॥

सखी-जूथन लिएँ बिबिध भोजन किएँ,
सुखद गिरिरबरधरन रिझवत सुहागि री।
जयति बिष्णुस्वामी पथ पावन श्रीबल्लभपद
पद्म बर नमत कुंजदास बड़भागि री॥
॥ इति संपूर्णंम् ॥

इस आरती का विशिष्ट महत्व

"आरती वारत राधिका नागरी" भगवान श्री कृष्ण के 'राधिकानाथ' (Radhikanath), अर्थात 'राधिका के स्वामी' स्वरूप को समर्पित एक अत्यंत मधुर और अनूठी आरती है। इस आरती की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें भक्त नहीं, बल्कि स्वयं श्री राधिका जी (Radha Rani) अपने प्रियतम श्री कृष्ण की आरती उतार रही हैं। यह आरती पुष्टिमार्ग संप्रदाय में विशेष रूप से गाई जाती है और इसके रचयिता भक्त कवि कुंजदास हैं, जिनका उल्लेख अंतिम पंक्ति में है। यह आरती प्रेम और समर्पण के सर्वोच्च भाव (Madhurya Bhava) को दर्शाती है।

आरती के प्रमुख भाव और अर्थ

यह आरती रूपक और अलंकारों से सुसज्जित है, जिसमें राधा जी का प्रेम ही पूजा की सामग्री बन जाता है:

  • प्रेममयी पूजा (Worship Full of Love): "तन कनक थार, भूषन रलदीपक लिएँ," - इस पंक्ति में राधा जी का अपना स्वर्ण समान शरीर ही आरती की थाली है, और उनके आभूषण (ornaments) ही दीपक हैं। यह प्रेम की पराकाष्ठा है।
  • दिव्य संगीत (Divine Music): "रुपित कटि मेखला सुभग घंटावली। झालर संख बजात जे करत उच्चारी॥" - उनकी कमर में बंधी करधनी ही घंटियां हैं और उनकी पायल की झंकार ही शंख और झालर की ध्वनि है, जो आरती के समय बज रही है।
  • समर्पण के प्रतीक (Symbols of Surrender): "अनुराग छत्र अंचल चमर नयन चल" - उनका प्रेम (love) ही कृष्ण के ऊपर छत्र है, उनका आँचल चंवर का काम कर रहा है, और उनके चंचल नेत्र ही भाव-पुष्पांजलि हैं।
  • पुष्टिमार्ग का संकेत (Indication of Pushtimarg): "जयति बिष्णुस्वामी पथ पावन श्रीबल्लभपद" - अंतिम पंक्तियों में श्री विष्णुस्वामी और श्री वल्लभाचार्य (Shri Vallabhacharya) के पथ का जयगान किया गया है, जो इस आरती को पुष्टिमार्गीय परंपरा से जोड़ता है।

आरती करने की विधि और विशेष अवसर

  • यह आरती विशेष रूप से राधाष्टमी (Radhashtami) और जन्माष्टमी (Janmashtami) के दिन गाई जाती है।
  • पुष्टिमार्ग के मंदिरों और घरों में, शयन आरती के समय इस पद का गायन करने की परंपरा है।
  • इस आरती को गाते समय, भक्त को स्वयं को राधा जी की एक सखी मानकर, उनके प्रेम-भाव में डूबकर भगवान कृष्ण का ध्यान करना चाहिए।
  • पूजा में दीपक और पुष्प के साथ, भगवान को मिश्री या दूध से बने भोग अर्पित करें। यह आरती मानसिक शांति और कृष्ण-भक्ति में वृद्धि के लिए अत्यंत फलदायी है।
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