आरती कीजे सुन्दर बरकी।
नन्दकिशोर जसोदानन्दन।
नागर नवल ताप-तम-हरकी॥
बनविलास मृदु हास मनोहर।
श्रवन सुधा सुख मोहन करकी॥
बिहारीदास लोचन चकोर नित।
अंस जु प्रिया लाल भुजधरकी॥
॥ इति संपूर्णंम् ॥
नन्दकिशोर जसोदानन्दन।
नागर नवल ताप-तम-हरकी॥
बनविलास मृदु हास मनोहर।
श्रवन सुधा सुख मोहन करकी॥
बिहारीदास लोचन चकोर नित।
अंस जु प्रिया लाल भुजधरकी॥
॥ इति संपूर्णंम् ॥
Aarti Keeje Sundar Barki.
Nandkishor Jasodanandan.
Nagar Naval Tap-Tam-Harki. ||
Banvilas Mridu Haas Manohar.
Shravan Sudha Sukh Mohan Karki. ||
Biharidas Lochan Chakor Nit.
Ans Ju Priya Lal Bhujdharki. ||
॥ Iti Sampurnam ॥
Nandkishor Jasodanandan.
Nagar Naval Tap-Tam-Harki. ||
Banvilas Mridu Haas Manohar.
Shravan Sudha Sukh Mohan Karki. ||
Biharidas Lochan Chakor Nit.
Ans Ju Priya Lal Bhujdharki. ||
॥ Iti Sampurnam ॥
इस आरती का विशिष्ट महत्व
"आरती कीजे सुन्दर बरकी" भगवान श्री कृष्ण के बाल स्वरूप, नन्दकिशोर (Nandkishor), को समर्पित एक मधुर और प्रेमपूर्ण आरती है। इस आरती में उन्हें 'नन्दकिशोर' (नन्द बाबा के पुत्र) और 'यशोदानंदन' (यशोदा को आनंद देने वाले) के रूप में पुकारा गया है, जो भक्तों के हृदय में वात्सल्य भाव (parental love) को जगाता है। यह आरती उनके द्वारिकाधीश या विराट स्वरूप के बजाय ब्रज के नटखट और मनमोहक कान्हा पर केंद्रित है। इस आरती के रचयिता भक्त कवि बिहारीदास (Biharidas) जी हैं, जिनका नाम अंतिम पंक्ति में आता है।
आरती के प्रमुख भाव और अर्थ
यह छोटी सी आरती गहरे भक्ति भावों से परिपूर्ण है:
- बाल स्वरूप की वंदना (Adoration of the Child Form): "आरती कीजे सुन्दर बरकी। नन्दकिशोर जसोदानन्दन।" यह पंक्ति सीधे उनके बाल रूप की सुंदरता और उनके माता-पिता के प्रति उनके स्नेहपूर्ण संबंध की वंदना करती है।
- कष्टों का निवारण (Remover of Sorrows): "नागर नवल ताप-तम-हरकी॥" उन्हें 'नागर नवल' (चतुर और नवीन) कहा गया है जो भक्तों के सभी ताप (सांसारिक कष्ट) और तम (अज्ञान के अंधकार) को हर लेते हैं।
- मनमोहक छवि (Enchanting Image): "बनविलास मृदु हास मनोहर।" यह पंक्ति उनकी मनमोहक मुस्कान और वन में की जाने वाली लीलाओं (forest pastimes) का स्मरण कराती है, जो कानों में अमृत घोलकर मन को मोह लेती हैं।
- भक्त की अनन्य दृष्टि (The Devotee's Singular Gaze): "बिहारीदास लोचन चकोर नित।" कवि कहते हैं कि मेरे नेत्र चकोर पक्षी की तरह हैं, जो सदैव आपके ચંદ્રમા रूपी मुख को निहारते रहते हैं, जिस पर प्रिया जी (राधा जी) का हाथ शोभायमान है।
आरती करने की विधि और विशेष अवसर
- यह आरती विशेष रूप से जन्माष्टमी (Janmashtami) के अवसर पर और दैनिक बाल गोपाल की सेवा-पूजा में गाई जाती है।
- भगवान कृष्ण के बाल स्वरूप की पूजा में बुधवार (Wednesday) का दिन शुभ माना जाता है।
- पूजा की थाली में दीपक, धूप, और भोग के लिए माखन-मिश्री (makhan-mishri) या दूध से बनी मिठाई रखें।
- इस आरती को वात्सल्य और प्रेम के भाव से गाना चाहिए, जैसे एक माँ अपने पुत्र की आरती उतारती है। इससे भगवान शीघ्र प्रसन्न होते हैं।
